शिक्षण की मूलभूत अवधारणा, उद्देश्य, स्तर और विशेषताएँ
शिक्षण की मूलभूत अवधारणा यह है कि यह केवल ज्ञान का हस्तांतरण नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया है। इसमें संज्ञानात्मक, भावात्मक और मनोदैहिक पक्षों का संतुलित विकास होता है, जिससे शिक्षा जीवनपर्यंत सीखने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का साधन बनती है।
शिक्षण की परिभाषा और अवधारणा
शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी दोनों सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
विद्वानों के अनुसार:
- मॉरिसन: शिक्षण एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है – शिक्षक पढ़ाता है और विद्यार्थी सीखता है।
- जॉन डीवी: इसे त्रिध्रुवीय प्रक्रिया माना – शिक्षक, विद्यार्थी और समाज/पाठ्यक्रम।
मुख्य विचार: शिक्षण केवल सूचनाएँ देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोचने, समझने और समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करता है।
शिक्षण के उद्देश्य
शिक्षण का लक्ष्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित होता है।
- संज्ञानात्मक उद्देश्य (Cognitive)
- ज्ञान अर्जन, समझ विकसित करना
- तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता बढ़ाना
- भावात्मक उद्देश्य (Affective)
- नैतिक मूल्यों का विकास
- सहानुभूति और सामाजिक संवेदनशीलता
- मनोदैहिक उद्देश्य (Psychomotor)
- व्यावहारिक कौशल विकसित करना
- आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास बढ़ाना
शिक्षण के स्तर
|
स्तर |
विशेषता |
उदाहरण |
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स्मृति
स्तर (Memory Level) |
तथ्यों
को याद करना, रटना |
इतिहास
की तिथियाँ, गणित के
सूत्र |
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बोध स्तर (Understanding
Level) |
विषय-वस्तु को समझना, विश्लेषण करना |
गणितीय प्रश्न हल करना |
|
चिंतन
स्तर (Reflective
Level) |
आलोचनात्मक
चिंतन, समस्या
समाधान |
वैज्ञानिक
प्रयोग, सामाजिक
समस्या का समाधान |
शिक्षण की विशेषताएँ
- लक्ष्य-उन्मुख (Goal-Oriented) – हर शिक्षण का एक निश्चित उद्देश्य होता है।
- सजीव और गतिशील प्रक्रिया – यह निरंतर बदलते परिवेश के अनुसार अनुकूलित होती है।
- मानवीय मूल्यों पर आधारित – शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी भी सिखाती है।
- कला और विज्ञान दोनों – शिक्षण में रचनात्मकता (कला) और तार्किकता (विज्ञान) का संतुलन होता है।
इस प्रकार शिक्षण की मूलभूत अवधारणा यह है कि यह केवल जानकारी देने की क्रिया नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन में स्थायी परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया है। यह ज्ञान, कौशल और मूल्यों का संतुलित विकास कर समाज को बेहतर बनाने का साधन है।
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